फलोदी/जोधपुर, राजस्थान | 17 अक्टूबर 2026 | विशेष रिपोर्ट
राजस्थान के फलोदी जिले की पूनिया की ढाणी से एक ऐसी दर्दनाक खबर सामने आई है, जिसने पूरे इलाके को गमगीन कर दिया। 1050 फीट गहरे बोरवेल में गिरे 9 वर्षीय मासूम भोमाराम को बचाने के लिए करीब 39 घंटे तक रेस्क्यू ऑपरेशन चलाया गया। परिजन, ग्रामीण और बचाव दल हर गुजरते पल के साथ उसके सुरक्षित बाहर आने की उम्मीद लगाए बैठे थे, लेकिन तमाम कोशिशों के बावजूद मासूम की जान नहीं बचाई जा सकी।
शनिवार तड़के करीब 3:35 बजे भोमाराम को बोरवेल से बाहर निकाला गया। उसे तत्काल एंबुलेंस से अस्पताल पहुंचाया गया, जहां चिकित्सकों ने जांच के बाद मृत घोषित कर दिया। जिस मासूम को सुरक्षित बाहर देखने के लिए पूरा इलाका दुआएं कर रहा था, उसकी मौत की खबर से परिवार पर दुखों का पहाड़ टूट पड़ा और गांव में शोक की लहर छा गई।
खेत में खेलते समय हुआ हादसा
जानकारी के अनुसार, गुरुवार 15 अक्टूबर को दोपहर करीब 12:30 बजे भोमाराम पूनिया की ढाणी में खेत पर था। इसी दौरान वह खुले बोरवेल में गिर गया। हादसे के समय खेत में नलकूप के पंप की मरम्मत का काम चल रहा था।
बच्चे के बोरवेल में गिरने की सूचना मिलते ही प्रशासन, पुलिस और बचाव दल मौके पर पहुंचे। शुरुआती जानकारी में सामने आया कि बोरवेल की कुल गहराई करीब 1050 फीट थी और भोमाराम लगभग 640 फीट नीचे फंसा हुआ था। इतनी अधिक गहराई और अंदर मौजूद अवरोधों ने बचाव अभियान को बेहद कठिन बना दिया।
NDRF और SDRF ने रात-दिन किया रेस्क्यू
हादसे के बाद राष्ट्रीय आपदा मोचन बल (NDRF), राज्य आपदा मोचन बल (SDRF) और स्थानीय प्रशासन की टीमें बच्चे को सुरक्षित बाहर निकालने में जुट गईं। बोरवेल में कैमरा डालकर उसकी स्थिति पर नजर रखने और ऑक्सीजन पहुंचाने सहित कई प्रयास किए गए।
रेस्क्यू के दौरान बोरवेल के अंदर फंसा एक बड़ा पत्थर सबसे बड़ी बाधा बन गया। बताया गया कि यह पत्थर बच्चे से करीब 30 फीट ऊपर अटका हुआ था। इसके कारण बचाव उपकरणों को नीचे तक पहुंचाने में परेशानी हो रही थी।
शुक्रवार सुबह कैमरे में बच्चे की हलचल दिखाई देना बंद हो गया, जिससे परिजनों और बचाव दल की चिंता और बढ़ गई। इसके बावजूद ऑपरेशन जारी रखा गया और बच्चे को बाहर निकालने के लिए लगातार प्रयास होते रहे।
जब आधुनिक उपकरणों के सामने आई चुनौती, तब काम आया देसी जुगाड़
रेस्क्यू अभियान में सबसे कठिन चुनौती बोरवेल के भीतर फंसे पत्थर को हटाना था। लगातार प्रयासों के बावजूद जब पारंपरिक तरीकों से सफलता नहीं मिली, तब स्थानीय रेस्क्यू विशेषज्ञ मादाराम सुथार और उनकी टीम ने एक विशेष उपकरण तैयार किया।
मीडिया रिपोर्टों के मुताबिक, टीम ने लोहे के सरियों को वेल्डिंग से जोड़कर चिमटेनुमा उपकरण बनाया। बोरवेल के अंदर कैमरे से मिली जानकारी के आधार पर उपकरण का आकार तैयार किया गया, ताकि अवरोध को हटाने और बच्चे तक पहुंचने का प्रयास किया जा सके।
करीब 34 घंटे की मशक्कत के बाद पत्थर को बाहर निकालने में सफलता मिली। इसके बाद बच्चे को बाहर लाने की कोशिशें आगे बढ़ाई गईं। आखिरकार शुक्रवार देर रात से शनिवार तड़के के बीच भोमाराम को बाहर निकाला गया, लेकिन तब तक बहुत देर हो चुकी थी। अस्पताल में डॉक्टरों ने उसे मृत घोषित कर दिया। \
39 घंटे की उम्मीद, लेकिन अंत में मिली मायूसी
करीब 39 घंटे तक चले इस अभियान का अंत बेहद दुखद रहा। बचाव दल ने बच्चे को निकालने के लिए लगातार मेहनत की और कठिन परिस्थितियों में कई तरीके अपनाए। स्थानीय विशेषज्ञों के देसी उपकरण से पत्थर हटाने में सफलता मिली, लेकिन भोमाराम को जीवन नहीं मिल सका।
इस हादसे ने परिवार को गहरे सदमे में डाल दिया। ग्रामीणों की उम्मीदें भी उस समय टूट गईं, जब बच्चे को अस्पताल में मृत घोषित किए जाने की खबर आई। पूरे क्षेत्र में शोक का माहौल बन गया।
खुले बोरवेल आखिर कब बनेंगे हादसों से मुक्त?
भोमाराम की मौत केवल एक परिवार की त्रासदी नहीं, बल्कि खुले और असुरक्षित बोरवेलों से पैदा होने वाले खतरे की गंभीर याद दिलाती है। खेतों और ग्रामीण इलाकों में अनुपयोगी या खुले पड़े बोरवेल बच्चों के लिए जानलेवा साबित हो सकते हैं।
ऐसे हादसों को रोकने के लिए जरूरी है कि खुले बोरवेल को तत्काल सुरक्षित तरीके से बंद किया जाए, उनके आसपास उचित सुरक्षा व्यवस्था हो और प्रशासन नियमित निरीक्षण करे। किसी भी खुले बोरवेल को लावारिस छोड़ना एक गंभीर जोखिम है, जिसकी कीमत कभी-कभी मासूम जिंदगियों को चुकानी पड़ती है।
आमजन से विशेष अपील:
भोमाराम के साथ हुआ यह दर्दनाक हादसा हम सभी के लिए एक गंभीर चेतावनी है। हमारी छोटी-सी लापरवाही किसी परिवार की जिंदगी भर की खुशियां छीन सकती है। इसलिए सभी किसान भाइयों, जमीन मालिकों और आमजन से अपील है कि अपने खेतों, घरों और आसपास मौजूद सभी खुले या अनुपयोगी बोरवेल को तुरंत सुरक्षित तरीके से बंद करवाएं। बोरवेल के मुंह पर मजबूत ढक्कन लगाएं और उसकी सुरक्षा सुनिश्चित करें। केवल ढीली मिट्टी या अस्थायी ढक्कन से उसे ढककर न छोड़ें किसी भी खुले बोरवेल को लावारिस छोड़ना एक गंभीर जोखिम है, जिसकी कीमत कभी-कभी मासूम जिंदगियों को चुकानी पड़ती है
संवाददाता: ओमप्रकाश गोदारा