मध्य प्रदेश उच्च न्यायालय की जबलपुर पीठ ने गुरुवार को केंद्रीय प्रशासनिक न्यायाधिकरण (कैट) के उस आदेश को चुनौती देने वाली केंद्र सरकार की याचिका खारिज कर दी, जिसमें 120 दिनों के भीतर भारतीय पुलिस सेवा (आईपीएस) कैडर की समीक्षा का निर्देश दिया गया था। जस्टिस विवेक रूसिया और प्रदीप मित्तल की पीठ ने कैट के आदेश को बरकरार रखा।

मध्य प्रदेश पुलिस एसोसिएशन ने कैट में आवेदन दायर कर कहा कि भारतीय पुलिस सेवा (कैडर) नियम, 1954 के तहत हर पांच साल में कैडर समीक्षा अनिवार्य है, लेकिन पिछले दो दशकों से इस प्रक्रिया में लगातार देरी हो रही है। इसमें कहा गया कि अन्य राज्यों की तुलना में मध्य प्रदेश कैडर के अधिकारी पिछड़ रहे हैं, जिससे असमानता पैदा हो रही है।
एसोसिएशन ने कहा कि देरी के कारण, कई पात्र राज्य पुलिस सेवा अधिकारी पदोन्नति और आईपीएस में शामिल होने के अपने संवैधानिक अधिकार से वंचित हो रहे हैं। इसमें बताया गया कि यदि देरी जारी रही, तो कई अधिकारी 56 वर्ष की आयु सीमा पार कर जाएंगे और स्थायी रूप से शामिल होने का अवसर खो देंगे।
9 जनवरी को अपने आदेश में ट्रिब्यूनल ने कहा कि इस तरह की देरी संविधान के अनुच्छेद 14 और 16 के तहत समानता और पदोन्नति के मौलिक अधिकारों का उल्लंघन है। ट्रिब्यूनल ने इसे अधिकारियों के भविष्य के साथ खिलवाड़ करार देते हुए कहा कि हर पांच साल में कैडर समीक्षा कराना सरकारों का स्पष्ट दायित्व है. ट्रिब्यूनल ने निर्देश दिया कि आईपीएस कैडर समीक्षा 120 दिनों के भीतर पूरी की जाए।
आदेश को चुनौती देते हुए, केंद्र सरकार ने उच्च न्यायालय में एक याचिका दायर की और कहा कि कैडर समीक्षा प्रक्रिया समय-समय पर और नियमों के अनुसार की गई थी। यह सुनिश्चित किया गया कि कोई देरी न हो।